Thursday, June 18, 2020

गजल दोष

आज यहाँ ग़ज़ल के कुछ दोषों पर प्रकाश डाल रहा हूँ। 
by संदीप द्विवेदी जी 
आभार सहित 

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इक़्फ़ा -

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यह क़ाफ़िये का दोष होता है। दो ऐसे अक्षर जो उच्चारण में समीपवर्ती हों या समान हों और उन्हें लिखा अलग ढंग से जाता हो, उनके वर्ण भिन्न हों जैसे 'सिपाह' और 'सबाह' (पहले में उर्दू की छोटी 'हे' है और दूसरे में बड़ी 'हे') तो यह दोष उत्पन्न होता है। देवनागरी में यह दोष 'केश' के साथ 'शेष' या 'मेष' जैसा क़ाफ़िया लेने से उत्पन्न होता है।

इक़्वा -

=====

यह भी क़ाफ़िये का दोष होता है। रवी* से पहले के अक्षर की मात्रा यदि एक सी न हो तो यह दोष उत्पन्न होता है। जैसे 'गुल' और 'दिल'। गुल पर 'उ' की और दिल पर 'इ' की मात्रा है, या फिर 'रुक' और 'तक' (भले ही दोनों शब्दों में अंतिम अक्षर 'क' है किन्तु पहले शब्द में उकार है और दूसरे में अकार)। यही दोष बढ़ जाने पर ईता दोष को जन्म देता है। (*रवी= काफ़िये का वास्तविक आनुप्रासिक अक्षर जिसके पहले के अक्षरों की मात्रा/ स्वर समान होना आवश्यक है । जैसे की 'नज़र' और 'असर', इनमें 'र' रवी का अक्षर है तथा 'ज़' और 'स' दोनों 'अकार' हैं।)

ईता -

====

यह क़ाफ़िये का दोष होता है जिसमें दो ऐसे शब्द जो सानुप्रास न हों उन्हें बढ़ा कर काफ़िया बनाना। यह दो प्रकार का होता है।

ईता-ए-ख़फ़ी (छोटी ईता) -

=================

इस दोष को हल्का माना जाता है किन्तु दोष तो दोष ही होता है और उससे बचने का प्रयास सदैव करना चाहिए। उदाहरण - ' रुक ' और ' थक' से ' रुकता' और ' थकता' बनाना। यहाँ रवी तो समान है पर उसके पहले मात्रा में साम्य नहीं है और 'ता' बढ़ाया गया है।

ईता-ए-जली (बड़ी ईता) -

================

इस दोष को भारी माना जाता है। जैसे 'ख़ुश' और 'बेह' जो क़त्तई सानुप्रास नहीं हैं, पर 'तर' बढ़ा कर 'ख़ुशतर' और 'बेहतर' बनाना।

तक़ाबुले रदीफ़-

==========

जब मत्ले के अलावा किसी भी शे'र के मिसर-ए-उला (पहले मिसरे) का अंतिम शब्द रदीफ़ के सानुप्रास हो रहा हो अर्थात् रदीफ़ के स्वर अथवा शब्द का अनुप्रासिक अंश अथवा पूरा रदीफ़ पहले मिसरे के अंत में आ रहा हो तो और वह शे'र अकेला कोट किया जाए तो सानुप्रासिकता के कारण मत्ले का भ्रम होता है। ग़ैर मुरद्दफ़ (बिना रदीफ़ की) ग़ज़लों में ऐसे शे'र मत्ले की ठीक बाद हुस्ने मतला के रूप में आने चाहिए अन्यथा रदीफ़ न होते हुए भी उन्हें दोषपूर्ण माना जाएगा।

ऐबे तनाफ़ुर -

========

मिसरे में किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता अर्थात एक ही उद्गम का अक्षर होने पर शेर पढ़ते समय उसका उच्चारण परवर्तित हो जाता है इसे ही ऐबे तनाफ़ुर कहते हैं। जैसे - बात + तो = बात्तो, कर+रहा = कर्रहा आदि। हालाँकि यह दोष बहुत हल्का होता है और शे'र कहते वक़्त शाइर अपने उच्चारण से इसे निभा ले जाये तो नगण्य हो जाता है।

शुतुर्गुर्बा -

======

एक ही शे'र में जब किसी को दो संबोधन जैसे- 'आप' और 'तुम' दिए जाएँ तो यह शुतुर्गुर्बा दोष कहलाता है। किसी भी हालत में इससे बचना चाहिए।

तख़ालुफ़ -

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शे'र को वज़्न में रखने के लिए किसी शब्द के हिज्जों से छेड़छाड़ करना जैसे - क़िस्म को किसम या फ़िक्र को फ़िकर लिखना। यह अरूज़ के नियमों के विरुद्ध होता है।

----------

इसके अतिरिक्त ग़ज़ल में अन्य कई दोष होते हैं परन्तु अभी के लिए इतना ही पर्याप्त प्रतीत होता है।

आप सभी ग़ज़लप्रेमियों के सुझाव-सलाह-प्रश्न-समाधान आमंत्रित हैं।

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(अल्लामा सीमाब अकबराबादी लिखित 'राज़-ए-अरूज़' से उद्धृत)

**पूर्ण प्रयास किया है कि लेख त्रुटिरहित हो फिर भी मानवीय चूक संभावित है, अतः अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ।

 

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इक़्फ़ा -

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यह क़ाफ़िये का दोष होता है। दो ऐसे अक्षर जो उच्चारण में समीपवर्ती हों या समान हों और उन्हें लिखा अलग ढंग से जाता हो, उनके वर्ण भिन्न हों जैसे 'सिपाह' और 'सबाह' (पहले में उर्दू की छोटी 'हे' है और दूसरे में बड़ी 'हे') तो यह दोष उत्पन्न होता है। देवनागरी में यह दोष 'केश' के साथ 'शेष' या 'मेष' जैसा क़ाफ़िया लेने से उत्पन्न होता है।

इक़्वा -

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यह भी क़ाफ़िये का दोष होता है। रवी* से पहले के अक्षर की मात्रा यदि एक सी न हो तो यह दोष उत्पन्न होता है। जैसे 'गुल' और 'दिल'। गुल पर 'उ' की और दिल पर 'इ' की मात्रा है, या फिर 'रुक' और 'तक' (भले ही दोनों शब्दों में अंतिम अक्षर 'क' है किन्तु पहले शब्द में उकार है और दूसरे में अकार)। यही दोष बढ़ जाने पर ईता दोष को जन्म देता है। (*रवी= काफ़िये का वास्तविक आनुप्रासिक अक्षर जिसके पहले के अक्षरों की मात्रा/ स्वर समान होना आवश्यक है । जैसे की 'नज़र' और 'असर', इनमें 'र' रवी का अक्षर है तथा 'ज़' और 'स' दोनों 'अकार' हैं।)

ईता -

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यह क़ाफ़िये का दोष होता है जिसमें दो ऐसे शब्द जो सानुप्रास न हों उन्हें बढ़ा कर काफ़िया बनाना। यह दो प्रकार का होता है।

ईता-ए-ख़फ़ी (छोटी ईता) -

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इस दोष को हल्का माना जाता है किन्तु दोष तो दोष ही होता है और उससे बचने का प्रयास सदैव करना चाहिए। उदाहरण - ' रुक ' और ' थक' से ' रुकता' और ' थकता' बनाना। यहाँ रवी तो समान है पर उसके पहले मात्रा में साम्य नहीं है और 'ता' बढ़ाया गया है।

ईता-ए-जली (बड़ी ईता) -

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इस दोष को भारी माना जाता है। जैसे 'ख़ुश' और 'बेह' जो क़त्तई सानुप्रास नहीं हैं, पर 'तर' बढ़ा कर 'ख़ुशतर' और 'बेहतर' बनाना।

तक़ाबुले रदीफ़-

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जब मत्ले के अलावा किसी भी शे'र के मिसर-ए-उला (पहले मिसरे) का अंतिम शब्द रदीफ़ के सानुप्रास हो रहा हो अर्थात् रदीफ़ के स्वर अथवा शब्द का अनुप्रासिक अंश अथवा पूरा रदीफ़ पहले मिसरे के अंत में आ रहा हो तो और वह शे'र अकेला कोट किया जाए तो सानुप्रासिकता के कारण मत्ले का भ्रम होता है। ग़ैर मुरद्दफ़ (बिना रदीफ़ की) ग़ज़लों में ऐसे शे'र मत्ले की ठीक बाद हुस्ने मतला के रूप में आने चाहिए अन्यथा रदीफ़ न होते हुए भी उन्हें दोषपूर्ण माना जाएगा।

ऐबे तनाफ़ुर -

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मिसरे में किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता अर्थात एक ही उद्गम का अक्षर होने पर शेर पढ़ते समय उसका उच्चारण परवर्तित हो जाता है इसे ही ऐबे तनाफ़ुर कहते हैं। जैसे - बात + तो = बात्तो, कर+रहा = कर्रहा आदि। हालाँकि यह दोष बहुत हल्का होता है और शे'र कहते वक़्त शाइर अपने उच्चारण से इसे निभा ले जाये तो नगण्य हो जाता है।

शुतुर्गुर्बा -

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एक ही शे'र में जब किसी को दो संबोधन जैसे- 'आप' और 'तुम' दिए जाएँ तो यह शुतुर्गुर्बा दोष कहलाता है। किसी भी हालत में इससे बचना चाहिए।

तख़ालुफ़ -

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शे'र को वज़्न में रखने के लिए किसी शब्द के हिज्जों से छेड़छाड़ करना जैसे - क़िस्म को किसम या फ़िक्र को फ़िकर लिखना। यह अरूज़ के नियमों के विरुद्ध होता है।

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इसके अतिरिक्त ग़ज़ल में अन्य कई दोष होते हैं परन्तु अभी के लिए इतना ही पर्याप्त प्रतीत होता है।

आप सभी ग़ज़लप्रेमियों के सुझाव-सलाह-प्रश्न-समाधान आमंत्रित हैं।

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(अल्लामा सीमाब अकबराबादी लिखित 'राज़-ए-अरूज़' से उद्धृत)

**पूर्ण प्रयास किया है कि लेख त्रुटिरहित हो फिर भी मानवीय चूक संभावित है, अतः अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ।

Tuesday, June 16, 2020

छंद


प्रमुख वर्णिक छंद
(1) इंद्रवज्रा (2) उपेन्द्रवज्रा (3) तोटक (4) वंशस्थ (5) द्रुतविलंबित (6) भुजंगप्रयात (7) वसंततिलका
(8) मालिनी (9) मंदाक्रांता (10) शिखरिणी (11) शार्दूलविक्रीडित (12) सवैया (13) कवित्त

(1) इंद्रवज्रा- प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। इनका क्रम है- तगण, नगण, जगण तथा अंत में दो गुरु (ऽऽ ।, । । ।, । ऽ।, ऽऽ) । यथा-

तूही बसा है मन में हमारे।
तू ही रमा है इस विश्र्व में भी।।
तेरी छटा है मनमुग्धकारी।
पापापहारी भवतापहारी।।

(2) उपेन्द्रवज्रा- प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। क्रम इस प्रकार है- जगण, तगण, जगण और अंत में दो गुरु (। ऽ।, ऽऽ ।, । ऽ।, ऽऽ) । यथा-

बड़ा कि छोटा कुछ काम कीजै।
परन्तु पूर्वापर सोच लीजै।।
बिना विचारे यदि काम होगा।।
कभी न अच्छा परिणाम होगा।।

(3) तोटक- प्रत्येक चरण में चार सगण ( । । ऽ) अर्थात १२ वर्ण होते हैं। यथा -

जय राम सदा सुखधाम हरे।
रघुनायक सायक-चाप धरे।।
भवबारन दारन सिंह प्रभो।
गुणसागर नागर नाथ विभो।।

(4) वंशस्थ- प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं। क्रम इस प्रकार है- जगण, तगण, जगण और रगण (। ऽ।, ऽऽ ।, । ऽ।, ऽ। ऽ) । यथा-

जहाँ लगा जो जिस कार्य बीच था।
उसे वहाँ ही वह छोड़ दौड़ता।।
समीप आया रथ के प्रमत्त सा।
विलोकन को घनश्याम माधुरी।।

(5) द्रुतविलम्बित- इस छन्द के प्रत्येक चरण में एक नगण (।।।), दो भगण (ऽ।।, ऽ।।)और एक रगण (ऽ।ऽ) के क्रम से 12 वर्ण होते हैं। उदाहरण-

न जिसमें कुछ पौरुष हो यहाँ,
सफलता वह पा सकता कहाँ ?

(6) भुजंगप्रयात- इसके प्रत्येक चरण में १२ वर्ण होते हैं। इसमें चार यगण होते हैं। यथा-

अरी व्यर्थ है व्यंजनों की बड़ाई।
हटा थाल तू क्यों इसे साथ लाई।।
वही पार है जो बिना भूख भावै।
बता किंतु तू ही उसे कौन खावै।।

(7) वसंततिलका- इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं। वर्णो के क्रम में तगण ( ऽऽ।), भगण (ऽ।।),
दो जगण (। ऽ।, । ऽ।) तथा दो गुरु ( ऽऽ) रहते हैं। जैसे-

रे क्रोध जो सतत अग्नि बिना जलावे।
भस्मावशेष नर के तन को बनावे।।
ऐसा न और तुझ-सा जग बीच पाया।
हारे विलोक हम किंतु न दृष्टि आया।

(8) मालिनी- इस छन्द में । ऽ वर्ण होते हैं तथा आठवें व सातवें वर्ण पर यति होती है। वर्णों के क्रम में
दो नगण (।।।, ।।।), एक मगन (ऽऽऽ) तथा दो यगण (।ऽऽ, ।ऽऽ) होते हैं; जैसे-

पल-पल जिसके मैं पन्थ को देखती थी,
निशिदिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती।

(9) मन्दाक्रान्ता- इस छन्द के प्रत्येक चरण में एक मगण (ऽऽऽ), एक भगण (ऽ।।), एक नगण (।।।), दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।) तथा दो गुरु (ऽऽ) मिलाकर 17 वर्ण होते हैं। चौथे, छठवें तथा सातवें वर्ण पर यति होती है; जैसे-

तारे डूबे, तम टल गया, छा गई व्योम-लाली।
पक्षी बोले, तमचर, जगे, ज्योति फैली दिशा में।।
शाखा डोली तरु निचय की, कंज फूले सरों के।
धीरे-धीरे दिनकर कढ़े, तामसी रात बीती।।

(10) शिखरिणी- इस छन्द के प्रत्येक चरण में एक यगण (।ऽऽ), एक मगण (ऽऽऽ), एक नगण (।।।), एक सगण (।।ऽ), एक भगण ( ऽ।।), एक लघु (।) एवं एक गुरु (ऽ) होता है। इसमें 17 वर्ण तथा छः वर्णों पर यति होता है; जैसे-

मनोभावों के हैं शतदल जहाँ शोभित सदा।
कलाहंस श्रेणी सरस रस-क्रीड़ा-निरत है।।
जहाँ हत्तंत्री की स्वरलहरिका नित्य उठती।
पधारो हे वाणी, बनकर वहाँ मानसप्रिया।।

(11) शार्दूलविक्रीडित- इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। क्रम इस प्रकार है- मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण, और अंत में गुरु। यति 12, 7 वर्णों पर होती है। यथा-

सायंकाल हवा समुद्र-तट की आरोग्यकारी यहाँ।
प्रायः शिक्षित सभ्य लोग नित ही जाते इसी से वहाँ।।
बैठे हास्य-विनोद-मोद करते सानंद वे दो घड़ी।
सो शोभा उस दृश्य की ह्रदय को है तृप्ति देती बड़ी।।

(12) सुन्दरी सवैया- जिन छंदों के प्रत्येक चरण में 22 से 26 वर्ण होते है, उन्हें 'सवैया' कहते हैं।

यह बड़ा ही मधुर एवं मोहक छंद है। इसका प्रयोग तुलसी, रसखान, मतिराम, भूषण, देव, घनानंद तथा भारतेंदु जैसे कवियों ने किया है। इसके अनेक प्रकार और अनेक नाम हैं; जैसे- मत्तगयंद, दुर्मिल, किरीट, मदिरा, सुंदरी, चकोर आदि।

इस छन्द के प्रत्येक चरण में आठ सगण (।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ,।।ऽ) और अन्त में एक गुरु (ऽ) मिलाकर 25 वर्ण होते है; जैसे-

मानुष हों तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हों तो कहा बसु मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।।
पाहन हों तो वही गिरि को जो धरयौ करछत्र पुरंदर धारन।
जौ खग हों तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।।

(13) कवित्त- यह वर्णिक छंद है। इसमें गणविधान नहीं होता, इसलिए इसे 'मुक्त वर्णिक छंद' भी कहते हैं।

कवित्त के प्रत्येक चरण में 31 से 33 वर्ण होते हैं। इसके अनेक भेद हैं जिन्हें मनहरण, रूपघनाक्षरी, देवघनाक्षरी आदि नाम से पुकारते हैं।

मनहरण कवित्त का एक उदाहरण लें। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। अंत में गुरु होता है। 16, 15 वर्णो पर यति होती है। जैसे-

इंद्र जिमि जंभ पर बाडव सुअंभ पर,
रावण सदंभ पर रघुकुलराज हैं।
पौन वारिवाह पर संभु रतिनाह पर,
ज्यों सहस्त्रबाहु पर राम द्विजराज हैं।
दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुंड पर,
भूषण वितुंड पर जैसे मृगराज हैं।
तेज तम-अंस पर कान्ह जिमि कंस पर,
प्रमुख मात्रिक छन्द
(1) चौपाई- यह मात्रिक सम छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती है। चरण के अन्त में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना वर्जित है। तुक पहले चरण की दूसरे से और तीसरे की चौथे से मिलती है। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती है। उदाहरणार्थ-

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुनगन गावन लागे ।।

गुरु पद रज मृदु मंजुल मंजन। नयन अमिय दृग दोष विभंजन।।
तेहि करि विमल विवेक विलोचन। बरनउँ रामचरित भवमोचन ।।

(2) रोला (काव्यछन्द)- यह मात्रिक सम छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 और 13 मात्राओं पर यति ही अधिक प्रचलित है। प्रत्येक चरण के अन्त में दो गुरु या दो लघु वर्ण होते हैं। दो-दो चरणों में तुक आवश्यक है। उदाहरणार्थ-

जो जगहित पर प्राण निछावर है कर पाता।
जिसका तन है किसी लोकहित में लग जाता ।।

(3) हरिगीतिका- यह मात्रिक सम छन्द है। इस छन्द के प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं। 16 और 12 मात्राओं पर यति तथा अन्त में लघु-गुरु का प्रयोग ही अधिक प्रचलित है। उदाहरणार्थ-

कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ।।

(4) बरवै- यह मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। इस छन्द के विषम चरणों (प्रथम और तृतीय) में 12 और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 7 मात्राएँ होती है। सम चरणों के अन्त में जगण या तगण आने से इस छन्द में मिठास बढ़ती है। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती है। जैसे-

वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार।
सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार ।।

(5) दोहा- यह अर्द्धसममात्रिक छन्द है। इसमें 24 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरण (प्रथम व तृतीय) में 13-13 तथा सम चरण (द्वितीय व चतुर्थ) में 11-11 मात्राएँ होती हैं; जैसे-

''मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाँई परे, स्याम हरित दुति होय।।''

(6) सोरठा- यह भी अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। यह दोहा का विलोम है, इसके प्रथम व तृतीय चरण में 11-11 और द्वितीय व चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती है; जैसे-

''सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहँसे करुना ऐन चितइ जानकी लखन तन।।''

(7) वीर- इसके प्रत्येक चरण में 31 मात्राएँ होती हैं। 16, 15 पर यति पड़ती है। अंत में गुरु-लघु का विधान है। 'वीर' को ही 'आल्हा' कहते हैं।

सुमिरि भवानी जगदंबा को, श्री शारद के चरन मनाय।
आदि सरस्वती तुमको ध्यावौं, माता कंठ विराजौ आय।।
ज्योति बखानौं जगदंबा कै, जिनकी कला बरनि ना जाय।
शरच्चंद्र सम आनन राजै, अति छबि अंग-अंग रहि जाय।।

(8) उल्लाला- इसके पहले और तीसरे चरणों में 15-15 तथा दूसरे और चौथे चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं। यथा-

हे शरणदायिनी देवि तू, करती सबका त्राण है।
हे मातृभूमि ! संतान हम, तू जननी, तू प्राण है।।

(9) कुंडलिया- यह 'संयुक्तमात्रिक छंद' है। इसका निर्माण दो मात्रिक छंदों-दोहा और रोला-के योग से होता है। पहले एक दोहा रख लें और उसके बाद दोहा के चौथे चरण से आरंभ कर यदि एक रोला रख दिया जाए तो वही कुंडलिया छंद बन जाता है। जिस शब्द से कुंडलिया प्रारंभ हो, समाप्ति में भी वही शब्द रहना चाहिए- यह नियम है, किंतु इधर इस नियम का पालन कुछ लोग छोड़ चुके हैं। दोहा के प्रथम और द्वितीय चरणों में (13 + 11) 24 मात्राएँ होती हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों (13 + 11) में भी 24 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार दोहे के चार चरण कुंडलिया के दो चरण बन जाते हैं। रोला सममात्रिक छंद हैं जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रारंभ के दो चरणों में 13 और 11 मात्राएँ पर यति होती है तथा अंत के चार चरणों में 11 और 13 मात्राओं पर।

हिन्दी में गिरिधर कविराय कुंडलियों के लिए विशेष प्रसिद्ध हैं। वैसे तुलसी, केशव आदि ने भी कुछ कुंडलियाँ लिखी हैं। उदाहरण देखें-

दौलत पाय न कीजिए, सपने में अभिमान।
चंचल जल दिन चारि कौ, ठाउँ न रहत निदान।।
ठाउँ न रहत निदान, जियन जग में जस लीजै।
मीठे बचन सुनाय, विनय सबही की कीजै।।
कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घर तौलत।
पाहुन निसिदिन चारि, रहत सब ही के दौलत।।

(10) छप्पय- यह संयुक्तमात्रिक छंद है। इसका निर्माण मात्रिक छंदों- रोला और उल्लाला- के योग से होता है। पहले रोला को रख लें जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होंगी। इसके बाद एक उल्लाला को रखें। उल्लाला के प्रथम तथा द्वितीय चरणों में (15 + 13) 28 मात्राएँ होंगी तथा तृतीय और चतुर्थ चरणों में भी (15 + 13) 28 मात्राएँ होंगी। रोला के चार चरण तथा उल्लाला के चार चरण- जो यहाँ दो चरण हो गये हैं- मिलकर छप्पय के छह चरण अर्थात छह पाद या पाँव हो जाएँगे। प्रथम चार चरणों में 11, 13 तथा अंत के दो चरणों में 14, 13 मात्राओं पर यति होगी।

जिस प्रकार तुलसी की चौपाइयाँ, बिहारी के दोहे, रसखान के सवैये, पद्माकर के कवित्त तथा गिरिधर कविराय की कुंडलिया प्रसिद्ध हैं; उसी प्रकार नाभादास के छप्पय प्रसिद्ध हैं। उदाहरण के लिए मैथलीशरण गुप्त का एक छप्पय देखें-

जिसकी रज में लोट-पोट कर बड़े हुए हैं।
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं।।
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
जिसके कारण धूल-भरे हीरे कहलाये।।
हम खेले कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि ! तुमको निरख मग्न क्यों न हों मोद में।।

मुक्तछंद
मुक्तछंद में न तो वर्णों का बंधन होता है और न मात्राओं का ही। कवि का भावोच्छ्वास काव्य की एक पूर्ण इकाई में व्यक्त हो जाता है। मुक्तछंद पर्वत के अंतस्तल से फूटता स्रोत है, जो अपने लिए मार्ग बना लेता है। मुक्त छंद के लिए बने-बनाये ढाँचे अनुपयुक्त होते हैं। उदाहरण के लिए एक मुक्तछंद देखें-

चितकबरे चाँद को छेड़ो मत
शकुंतला-लालित-मृगछौना-सा अलबेला है।
प्रणय के प्रथम चुंबन-सा
लुके-छिपे फेंके इशारे-सा कितना भोला है।
टाँग रहा किरणों के झालर शयनकक्ष में चौबारा
ओ मत्सरी, विद्वेषी ! द्वेषानल में जलना अशोभन है।
दक्षिण हस्त से यदि रहोगे कार्यरत
तो पहनायेगा चाँद कभी न कभी जयमाला।

Sunday, April 26, 2020

छंद के प्रकार


दोहा मात्रिक छंद है। इसे अर्द्ध सम मात्रिक छंंद कहते हैं । दोहे में चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) चरण में 13-13 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है। दोहे के मुख्य 23 प्रकार हैं:- 1.भ्रमर, 2.सुभ्रमर, 3.शरभ, 4.श्येन, 5.मण्डूक, 6.मर्कट, 7.करभ, 8.नर, 9.हंस, 10.गयंद, 11.पयोधर, 12.बल, 13.पान, 14.त्रिकल 15.कच्छप, 16.मच्छ, 17.शार्दूल, 18.अहिवर, 19.व्याल, 20.विडाल, 21.उदर, 22.श्वान, 23.सर्प। दोहे में विषम एवं सम चरणों के कलों का क्रम निम्नवत होता है


विषम चरणों के कलों का क्रम 4+4+3+2 (चौकल+चौकल+त्रिकल+द्विकल) 3+3+2+3+2 (त्रिकल+त्रिकल+द्विकल+त्रिकल+द्विकल)


सम चरणों के कलों का क्रम 4+4+3 (चौकल+चौकल+त्रिकल) 3+3+2+3 (त्रिकल+त्रिकल+द्विकल+त्रिकल) उदाहरण -


रात-दिवस, पूनम-अमा, सुख-दुःख, छाया-धूप।यह जीवन बहुरूपिया, बदले कितने रूप॥


दोही दोहे का ही एक प्रकार है। इसके विषम चरणों में १५-१५ एवं सम चरणों में ११-११ मात्राऐं होती हैं।उदाहरण-


प्रिय पतिया लिख-लिख थक चुकी,मिला न उत्तर कोय।सखि! सोचो अब में क्या करूँ,सूझे राह न कोय।।


रोला मात्रिक सम छंद होता है। इसके प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण यति पर दो पदों में विभाजित हो जाता है l


पहले पद के कलों का क्रम निम्नवत होता है -

4+4+3 (चौकल+चौकल+त्रिकल) अथवा 3+3+2+3 (त्रिकल+त्रिकल+द्विकल+त्रिकल)


दूसरे पद के कलों का क्रम निम्नवत होता है -

3+2+4+4 (त्रिकल+द्विकल+चौकल+चौकल) अथवा 3+2+3+3+2 (त्रिकल+द्विकल+त्रिकल+त्रिकल+द्विकल) उदाहरण -


यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥


सोरठा अर्ध्दसम मात्रिक छंद है और यह दोहा का ठीक उलटा होता है। इसके विषम चरणों चरण में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्राका होना आवश्यक होता है। उदाहरण -


जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥


चौपाई मात्रिक सम छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। सिंह विलोकितपद्धरिअरिल्लअड़िल्ल,पादाकुलक आदि छंद चौपाई के समान लक्षण वाले छंद हैं।उदाहरण -


बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।सुरुचि सुबास सरस अनुराग॥अमिय मूरिमय चूरन चारू।समन सकल भव रुज परिवारू॥


कुण्डलिया विषम मात्रिक छंद है। इसमें छः चरण होते हैं अौर प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती हैं। दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलियासमाप्त भी होता है। उदाहरण -


कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै।बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥कह गिरिधर कविराय, मिलत है थोरे दमरी।सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥


गीतिका (छंद) मात्रिक सम छंद है जिसमें ​२६ मात्राएँ होती हैं​​​​।​ १४​ और ​१२ पर यति तथा अंत में लघु -गुरु ​आवश्यक है। ​इस छंद की तीसरी, दसवीं, सत्रहवीं और चौबीसवीं अथवा दोनों चरणों के तीसरी-दसवीं मात्राएँ लघु हों तथा अंत में रगण हो तो छंद निर्दोष व मधुर होता है। उदाहरण-


खोजते हैं साँवरे को,हर गली हर गाँव में।आ मिलो अब श्याम प्यारे,आमली की छाँव में।।आपकी मन मोहनी छवि,बाँसुरी की तान जो।गोप ग्वालों के शरीरोंं,में बसी ज्यों जान वो।। :वेद मंत्रो को विवेकी, प्रेम से पढने लगे


हरिगीतिका चार चरणों वाला एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 16 व 12 के विराम से 28 मात्रायें होती हैं तथा अंत में लघु गुरु आना अनिवार्य है। हरिगीतिका में 16 और 12 मात्राओं पर यति होती है। प्रत्येक चरण के अन्त में रगण आना आवश्यक है।


विशेष: 2212 की चार आवृत्तियों से बना रूप हरिगीतिका छंद का सर्वाधिक व्यावहारिक रूप है जिसे मिश्रितगीतिकाकह सकते हैं। वस्तुतः 11212 की चार आवृत्तियों से हरिगीतिका , 2212 की चार आवृत्तियों से श्रीगीतिका तथा दोनों स्वरक स्वैच्छिक चार आवृत्तियों से मिश्रितगीतिका छंद बनता है।


उदाहरण-


प्रभु गोद जिसकी वह यशोमति,दे रहे हरि मान हैं ।गोपाल बैठे आधुनिक रथ,पर सहित सम्मान हैं ॥मुरली अधर धर श्याम सुन्दर,जब लगाते तान हैं ।सुनकर मधुर धुन भावना में,बह रहे रसखान हैं॥


बरवै अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसमें प्रथम एवं तृतीय चरण में १२ -१२ मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में ७-७ मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में जगण होता है।उदाहरण-


चम्पक हरवा अंग मिलि,अधिक सुहाय।जानि परै सिय हियरे,जब कुंभिलाय।।


छप्पय मात्रिक विषम छन्द है। यह संयुक्त छन्द है, जो रोला (11+13) चार पद तथा उल्लाला (15+13) के दो पद के योग से बनता है।उदाहरण-


डिगति उर्वि अति गुर्वि, सर्व पब्बे समुद्रसर।ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिगपाल चराचर।दिग्गयन्द लरखरत, परत दसकण्ठ मुक्खभर।सुर बिमान हिम भानु, भानु संघटित परस्पर।चौंकि बिरंचि शंकर सहित,कोल कमठ अहि कलमल्यौ।ब्रह्मण्ड खण्ड कियो चण्ड धुनि, जबहिं राम शिव धनु दल्यौ।।


उल्लाला सम मात्रिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 13-13 मात्राओं के हिसाब से 26 मात्रायें तथा 15-13 के हिसाब से 28 मात्रायें होती हैं। इस तरह उल्लाला के दो भेद होते है। तथापि 13 मात्राओं वाले छन्द में लघु-गुरु का कोई विशेष नियम नहीं है लेकिन 11वीं मात्रा लघु ही होती है।15 मात्राओं वाले उल्लाला छन्द में 13 वीं मात्रा लघु होती है। 13 मात्राओं वाला उल्लाला बिल्कुल दोहे की तरह होता है,बस दूसरे चरण में केवल दो मात्रायें बढ़ जाती हैं। प्रथम चरण में लघु-दीर्घ से विशेष फर्क नहीं पड़ता। उल्लाला छन्द को चन्द्रमणि भी कहा जाता है।उदाहरण-


यों किधर जा रहे हैं बिखर,कुछ बनता इससे कहीं।संगठित ऐटमी रूप धर,शक्ति पूर्ण जीतो मही ॥


सवैया चार चरणों का समपद वर्णछंद है। वर्णिक वृत्तों में 22 से 26 अक्षर के चरण वाले जाति छन्दों को सामूहिक रूप से हिन्दी में सवैया कहा जाता है।सवैये के मुख्य १४ प्रकार हैं:- १. मदिरा, २. मत्तगयन्द, ३. सुमुखी, ४. दुर्मिल, ५. किरीट, ६. गंगोदक, ७. मुक्तहरा, ८. वाम, ९. अरसात, १०. सुन्दरी, ११. अरविन्द, १२. मानिनी, १३. महाभुजंगप्रयात, १४. सुखी। उदाहरण-


मानुस हौं तो वही रसखान,बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।जो पसु हौं तो कहा बस मेरो,चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥पाहन हौं तो वही गिरि को,जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन॥ ( कवि - रसखान )सेस गनेस महेस दिनेस,सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।जाहि अनादि अनंत अखण्ड,अछेद अभेद सुभेद बतावैं॥नारद से सुक व्यास रहे,पचिहारे तौं पुनि पार न पावैं।ताहि अहीर की छोहरियाँ,छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥। ( कवि - सूरदास )कानन दै अँगुरी रहिहौं,जबही मुरली धुनि मंद बजैहैं।माहिनि तानन सों रसखान,अटा चढ़ि गोधन गैहैं पै गैहैं॥टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि,काल्हि कोई कितनो समझैहैं।माई री वा मुख की मुसकान,सम्हारि न जैहैं,न जैहैं,न जैहैं॥

कवित्त या घनाक्षरी वृत्तसंपादित करें


कवित्त एक वार्णिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में १६, १५ के विराम से ३१ वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण के अन्त में गुरू वर्ण होना चाहिये। छन्द की गति को ठीक रखने के लिये ८, ८, ८ और ७ वर्णों पर यति रहना चाहिये। इसके सात प्रकार हैं:- १-रूप घनाक्षरी, २-देव घनाक्षरी, ३- मनहरण घनाक्षरी , ४-डमरु या कृपाण घनाक्षरी , ५ - जलहरण घनाक्षरी ६- ७-


उदाहरण- मनहरण घनाक्षरी


कालिन्दी कौ कुंज कूल, जल की है कल कल,कदम्ब की कारी कारी परी परछाई है ।अलि शुक पिक काक,मधुर मयूर वाक,कर में कमलिनी की कटि गदारई है।।घन घूमते घनेरे,धौरे धौरे श्याम धौरे,हिय में हिलोर ऋतु हरी हरि छाई है ,तज दीजो कामराज आज सब साजबाज,ब्रजराज साँवरे नै बंसुरी बजाई है।। ( कवि : पवन पागल )


मधुमालती छंद में प्रत्येक चरण में 14 मात्राएँ होती हैं, अंत में 212 वाचिक भार होता है, 5-12 वीं मात्रा पर लघु अनिवार्य होता है।उदाहरण -


होंगे सफल,धीरज धरो ,कुछ हम करें,कुछ तुम करो ।संताप में , अब मत जलो ,कुछ हम चलें , कुछ तुम चलो ।।


विजात छंद के प्रत्येक चरण में 14 मात्राएँ होती हैं, अंत में 222 वाचिक भार होता है, 1,8 वीं मात्रा पर लघु अनिवार्य होता है। उदाहरण -


तुम्हारे नाम की माला,तुम्हारे नाम की हाला ।हुआ जीवन तुम्हारा है,तुम्हारा ही सहारा है ।।


मनोरम छंद के प्रत्येक चरण में 14 मात्राएँ होती हैं ,आदि में 2 और अंत में 211 या 122 होता है ,3-10 वीं मात्रा पर लघु 1 अनिवार्य है।उदाहरण-


उलझनें पूजालयों में ,शांति है शौचालयों में।शान्ति के इस धाम आयें,उलझनों से मुक्ति पायें।।


शक्ति छंद में 18 मात्राओं के चार चरण होते हैं, अंत में वाचिक भार 12 होता है तथा 1,6,11,16 वीं मात्रा पर लघु 1 अनिवार्य होता है। उदाहरण -


चलाचल चलाचल अकेले निडर,चलेंगे हजारों, चलेगा जिधर।दया-प्रेम की ज्योति उर में जला,टलेगी स्वयं पंथ की हर बेला ।।


पीयूष वर्ष छंद में 10+9=19 मात्राओं के चार चरण होते हैं,अंत में 12 होता है तथा 3,10,17 वीं मात्रा पर लघु 1 अनिवार्य है। यदि यति अनिवार्य न हो और अंत में 2 = 11 की छूट हो तो यही छंद 'आनंदवर्धक' कहलाता है।उदाहरण-


लोग कैसे , गन्दगी फैला रहे ,नालियों में छोड़ जो मैला रहे।नालियों पर शौच जिनके शिशु करें,रोग से मारें सभी को खुद मरें।।


सुमेरु छंद के प्रत्येक चरण में 12+7=19 अथवा 10+9=19 मात्राएँ होती हैं ; 12,7 अथवा 10,9 पर यति होतो है ; इसके आदि में लघु 1 आता है जबकि अंत में 221,212,121,222 वर्जित हैं तथा 1,8,15 वीं मात्रा लघु 1 होती है।उदाहरण-


लहै रवि लोक सोभा , यह सुमेरु ,कहूँ अवतार पर , ग्रह केर फेरू।सदा जम फंद सों , रही हौं अभीता ,भजौ जो मीत हिय सों , राम सीता।।


सगुण छंद के प्रयेक चरण में 19 मात्राएँ होती हैं , आदि में 1 और अंत में 121 होता है,1,6,11, 16,19 वी मात्रा लघु 1 होती है।उदाहरण -


सगुण पञ्च चारौ जुगन वन्दनीय ,अहो मीत, प्यारे भजौ मातु सीय।लहौ आदि माता चरण जो ललाम ,सुखी हो मिलै अंत में राम धाम।।


शास्त्र छंद के प्रत्येक चरण में 20 मात्राएँ होती हैं ; अंत में 21 होता है तथा 1,8,15,20 वीं मात्राएँ लघु होती हैं।उदाहरण -


मुनीके लोक लहिये शास्त्र आनंद ,सदा चित लाय भजिये नन्द के नन्द।सुलभ है मार प्यारे ना लगै दाम ,कहौ नित कृष्ण राधा और बलराम।।


सिन्धु छंद के प्रत्येक चरण में 21 मात्राएँ होती है और 1,8,15 वीं मात्रा लघु 1 होती है।उदाहरण -


लखौ त्रय लोक महिमा सिन्धु की भारी ,तऊ पुनि गर्व के कारण भयो खारी।लहे प्रभुता सदा जो शील को धारै ,दया हरि सों तरै कुल आपनो तारै।।


बिहारी छंद के प्रत्येक चरण में 14+8=22 मात्राएँ होती हैं,14,8 मात्रा पर यति होती है तथा 5,6,11,12,17,18 वीं मात्रा लघु 1 होती है। उदाहरण -


लाचार बड़ा आज पड़ा हाथ बढ़ाओ ,हे श्याम फँसी नाव इसे पार लगाओ।कोई न पिता मात सखा बन्धु न वामा ,हे श्याम दयाधाम खड़ा द्वार सुदामा।।


दिगपाल छंद के प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं ;12,24 मात्रा पर यति होती है,आदि में समकल होता है और 5,8,17,20 वीं मात्रा अनिवार्यतः लघु 1 होती है।इस छंद को मृदुगति भी कहते हैं।उदाहरण-


सविता विराज दोई , दिक्पाल छन्द सोईसो बुद्धि मंत प्राणी, जो राम शरण होई।रे मान बात मेरी, मायाहि त्यागि दीजैसब काम छाँड़ि मीता, इक राम नाम लीजै।।


सारस छंद के प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं , 12,12 मात्रा पर यति होती है ;आदि में विषम कल होता है और 3,4,9,10,15,16,21,22 वीं मात्राएँ अनिवार्यतः लघु 1 होती हैं।उदाहरण-


भानु कला राशि कला, गादि भला सारस हैराम भजत ताप भजत, शांत लहत मानस है।शोक हरण पद्म चरण, होय शरण भक्ति सजौराम भजौ राम भजौ, राम भजौ राम भजौ।।


गीता छंद के प्रत्येक चरण में 26 मात्राएँ होती हैं; 14,12 पर यति होती है , आदि में सम कल होता है ; अंत में 21 आता है और 5,12,19,26 वीं मात्राएँ अनिवार्यतः लघु 1 होती हैं।उदहारण -


कृष्णार्जुन गीता भुवन, रवि सम प्रकट सानंद lजाके सुने नर पावहीं, संतत अमित आनंद lदुहुं लोक में कल्याण कर, यह मेट भाव को शूल lतातें कहौं प्यारे कवौं, उपदेश हरि ना भूल ll


शुद्ध गीता छंद के प्रत्येक चरण में 27 मात्राएँ होती हैं ; 14,13 मात्रा पर यति होती है . आदि में 21 होता है तथा 3,10,17,24,27 वीं मात्राएँ लघु होती हैं।उदाहरण -


मत्त चौदा और तेरा, शुद्ध गीता ग्वाल धारध्याय श्री राधा रमण को, जन्म अपनों ले सुधार।पाय के नर देह प्यारे, व्यर्थ माया में न भूलहो रहो शरणै हरी के, तौ मिटै भव जन्म शूल।।


विधाता छंद के प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती है ; 14,14 मात्रा पर यति होती है ; 1, 8, 15, 22 वीं मात्राएँ लघु 1 होती हैं। इसे शुद्धगा भी कहते हैं।


आप विधाता छंद का मात्रा भार इस तरह से भी समझ सकते हैं 1222 1222 1222 1222 से विधाता छंद होगा उदाहरण -


ग़ज़ल हो या भजन कीर्तन,सभी में प्राण भर देता ,अमर लय ताल से गुंजित,समूची सृष्टि कर देता।भले हो छंद या सृष्टा,बड़ा प्यारा 'विधाता' है ,सुहानी कल्पना जैसी,धरा सुन्दर सजाता है।।


हाकलि एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 14 मात्रा होती हैं , तीन चौकल के बाद एक द्विकल होता है। यदि तीन चौकल अनिवार्य न हों तो यही छंद 'मानव' कहलाता है।


उदाहरण -


बने बहुत हैं पूजालय,अब बनवाओ शौचालय।घर की लाज बचाना है,शौचालय बनवाना है।।


चौपई एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रयेक चरण में 16 मात्रा होती हैं, अंत में 21 अनिवार्य होता है, कुल चार चरण होते हैं, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। इस छंद को जयकरी भी कहते हैं। उदाहरण :


भोंपू लगा-लगा धनवान,फोड़ रहे जनता के कान।ध्वनि-ताण्डव का अत्याचार,कैसा है यह धर्म-प्रचार।।


पदपादाकुलक एक सम मात्रिक छंद है। इसके एक चरण में 16 मात्रा होती हैं,आदि में द्विकल अनिवार्य होता है किन्तु त्रिकल वर्जित होता है, पहले द्विकल के बाद यदि त्रिकल आता है तो उसके बाद एक और त्रिकल आता है,कुल चार चरण होते हैं, क्रमागत दो-दो चरण तुकान्त होते है।उदाहरण :


कविता में हो यदि भाव नहीं,पढने में आता चाव नहीं।हो शिल्प भाव का सम्मेलन,तब काव्य बनेगा मनभावन।।


श्रृंगार एक सम मात्रिक छंद है। इनके प्रत्येक चरण में 16 मात्रा होती हैं, आदि में क्रमागत त्रिकल-द्विकल (3+2) और अंत में क्रमागत द्विकल-त्रिकल (2+3) आते हैं, कुल चार चरण होते हैं,क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। उदाहरण :


भागना लिख मनुजा के भाग्य,भागना क्या होता वैराग्य।दास तुलसी हों चाहे बुद्ध,आचरण है यह न्याय विरुद्ध।।


राधिका एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 मात्रा होती हैं, 13,9 पर यति होती है, यति से पहले और बाद में त्रिकल आता है, कुल चार चरण होते हैं , क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं।उदाहरण :


मन में रहता है काम , राम वाणी में,है भारी मायाजाल, सभी प्राणी में।लम्पट कपटी वाचाल, पा रहे आदर,पुजता अधर्म है ओढ़, धर्म की चादर।।


यह एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 मात्रा होती हैं, 12,10 पर यति होती है , यति से पहले और बाद में त्रिकल आता है औए अंत में 22 आता है। यदि अंत में एक ही गुरु 2 आता है तो उसे उड़ियाना छंद कहते हैं l कुल चार चरण होते हैं, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं।


कुण्डल का उदाहरण :


गहते जो अम्ब पाद, शब्द के पुजारी,रचते हैं चारु छंद, रसमय सुखारी।।देती है माँ प्रसाद, मुक्त हस्त ऐसा,तुलसी रसखान सूर, पाये हैं जैसा।।

उड़ियाना का उदाहरण :


ठुमकि चालत रामचंद्र, बाजत पैंजनियाँ,धाय मातु गोद लेत, दशरथ की रनियाँ।तन-मन-धन वारि मंजु, बोलति बचनियाँ,कमल बदन बोल मधुर, मंद सी’ हँसनियाँ।। ( कवि : तुलसीदास )


रूपमाला एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 24 मात्राएं होती हैं एवं 14,10 पर यति होती है, आदि और अंत में वाचिक भार 21 होता है। कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरणों में तुकांत होता है। इसे मदन भी कहते हैं। उदाहरण :


देह दलदल में फँसे हैं, साधना के पाँव,दूर काफी दूर लगता, साँवरे का गाँव।क्या उबारेंगे कि जिनके, दलदली आधार,इसलिए आओ चलें इस, धुंध के उसपार।।


मुक्तामणि एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 25 मात्राएं होतीं हैं और 13,12 पर यति होती है। यति से पहले वाचिक भार 12 और चरणान्त में वाचिक भार 22 होता है। कुल चार चरण होते हैं; क्रमागत दो-दो चरण तुकांत। दोहे के क्रमागत दो चरणों के अंत में एक लघु बढ़ा देने से मुक्तामणि का एक चरण बनता है। उदाहरण :


विनयशील संवाद में, भीतर बड़ा घमण्डी,आज आदमी हो गया, बहुत बड़ा पाखण्डी।मेरा क्या सब आपका, बोले जैसे त्यागी,जले ईर्ष्या द्वेष में, बने बड़ा बैरागी।।


गगनांगना एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 25 मात्राएं होती हैं और 16,9 पर यति होती है एवं चरणान्त में 212। इसमें कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं।उदाहरण :


कब आओगी फिर, आँगन की, तुलसी बूझतीकिस-किस को कैसे समझाऊँ, युक्ति न सूझती।अम्बर की बाहों में बदरी, प्रिय तुम क्यों नहींभारी है जीवन की गठरी, प्रिय तुम क्यों नहीं।।


विष्णुपद एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 26 मात्राएं होतीं हैं और 16,10 पर यति होती है। अंत में वाचिक भार 2 होता है। इसमें कुल चार चरण होते हैं एवं क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। उदाहरण :


अपने से नीचे की सेवा, तीर-पड़ोस बुरा,पत्नी क्रोधमुखी यों बोले, ज्यों हर शब्द छुरा।बेटा फिरे निठल्लू बेटी, खोये लाज फिरे,जले आग बिन वह घरवाला, घर पर गाज गिरे।।


शंकर एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 26 मात्राएं होतीं हैं और 16,10 पर यति होती है एवं चरणान्त में 21। इसमें कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरणों पर तुकांत होता है।उदाहरण :


सुरभित फूलों से सम्मोहित, बावरे मत भूलइन फूलों के बीच छिपे हैं, घाव करते शूल।स्निग्ध छुअन या क्रूर चुभन हो, सभी से रख प्रीतआँसू पीकर मुस्काता चल, यही जग की रीत।।


सरसी एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 27 मात्राएं होती हैं औथ 16,11 पर यति होती है, चरणान्त में 21 लगा अनिवार्य है। इसमें कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। इस छंद को कबीर या सुमंदर भी कहते हैं। चौपाई का कोई एक चरण और दोहा का सम चरण मिलाने से सरसी का एक चरण बन जाता है l उदाहरण :


पहले लय से गान हुआ फिर,बना गान ही छंद,गति-यति-लय में छंद प्रवाहित,देता उर आनंद।जिसके उर लय-ताल बसी हो,गाये भर-भरतान,उसको कोई क्या समझाये,पिंगल छंद विधान।।


यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 22 मात्रा होती हैं एवं 8,8,6 पर यति होती है अंत में 112। चार चरण होते हैं एवं क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं।उदाहरण :


व्यस्त रहे जो, मस्त रहे वह, सत्य यही,कुछ न करे जो, त्रस्त रहे वह, बात सही।जो न समय का, मूल्य समझता, मूर्ख बड़ा,सब जाते उस, पार मूर्ख इस, पार खड़ा।।


यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 23 मात्रा होती हैं एवं 16,7 पर यति होती है और चरणान्त में 21। इसमें कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। उदाहरण :


बीमारी में चाहे जितना, सह लो क्लेश,पर रिश्ते-नाते में देना, मत सन्देश।आकर बतियायें, इठलायें, निस्संकोच,चैन लूट रोगी का, खायें, बोटी नोच।।


सार एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 28 मात्राएं होतीं हैं और 16,12 पर यति होती है। अंत में वाचिक भार 22 होता है। कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। उदाहरण :


कितना सुन्दर कितना भोला,था वह बचपन न्यारापल में हँसना पल में रोना,लगता कितना प्यारा।अब जाने क्या हुआ हँसी के,भीतर रो लेते हैंरोते-रोते भीतर-भीतर,बाहर हँस देते हैं।।


लावणी एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 30 मात्राएं होतीं हैं और 16,14 पर यति होती है। कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। इसके चरणान्त में वर्णिक भार 222 या गागागा अनिवार्य होने पर ताटंक , 22 या गागा होने पर कुकुभ और कोई ऐसा प्रतिबन्ध न होने पर यह लावणी छंद कहलाता है। उदाहरण :


तिनके-तिनके बीन-बीन जब,पर्ण कुटी बन पायेगी,तो छल से कोई सूर्पणखा,आग लगाने आयेगी।काम अनल चन्दन करने का,संयम बल रखना होगा,सीता सी वामा चाहो तो,राम तुम्हें बनना होगा।।


वीर एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 31 मात्राएं होतीं हैं और 16,15 पर यति होती है। चरणान्त में वाचिक भार 21 होता है। इसमें कुल चार चरण होते हैं और क्रमागत दो-दो चरणों पर तुकांत होते हैं। इसे आल्हा भी कहते हैं। उदाहरण :


विनयशीलता बहुत दिखाते,लेकिन मन में भरा घमण्ड,तनिक चोट जो लगे अहम् को,पल में हो जाते उद्दण्ड lगुरुवर कहकर टाँग खींचते,देखे कितने ही वाचाल,इसीलिये अब नया मंत्र यह,नेकी कर सीवर में डाल l


त्रिभंगी एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 32 मात्राएं होतीं हैं और 10,8,8,6 पर यति होती है एवं चरणान्त में 2 होता है। कुल चार चरण होते हैं और।क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं। पहली तीन या दो यति पर आतंरिक तुकांत होने से छंद का लालित्य बढ़ जाता है। तुलसी दास ने पहली दो यति पर आतंरिक तुकान्त का अनिवार्यतः प्रयोग किया है। उदाहरण :


तम से उर डर-डर, खोज न दिनकर, खोज न चिर पथ, ओ राही,रच दे नव दिनकर, नव किरणें भर, बना डगर नव, मन चाही lसद्भाव भरा मन, ओज भरा तन, फिर काहे को, डरे भला,चल-चल अकेला चल, चल अकेला चल, चल अकेला चल, चल अकेला l


कुण्डलिनी एक विषम मात्रिक छंद है। दोहा और अर्ध रोला को मिलाने से कुण्डलिनी छंद बनता है जबकि दोहा के चतुर्थ चरण से अर्ध रोला का प्रारंभ होता हो (पुनरावृत्ति)। इस छंद में यथारुचि प्रारंभिक शब्द या शब्दों से छंद का समापन किया जा सकता है (पुनरागमन), किन्तु यह अनिवार्य नहीं है। दोहा और रोला छंदों के लक्षण अलग से पूर्व वर्णित हैं l कुण्डलिनी छंद में कुल चार चरण होते हैं, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत होते हैं।


कुण्डलिनी = दोहा + अर्धरोला

उदाहरण :


जननी जनने से हुई, माँ ममता से मान,जननी को ही माँ समझ, भूल न कर नादान।भूल न कर नादान, देख जननी की करनी,करनी से माँ बने, नहीं तो जननी जननी।।


इसके सम चरण में 11-11 और विषम चरण में 10 वर्ण होते हैं। विषम चरणों में दो सगण , एक जगण , एक सगण और एक लघु व एक गुरु होते हैं। जैसे -


विधि ना कृपया प्रबोधिता,सहसा मानिनि सुख से सदाकरती रहती सदैव हीकरुण की मद-मय साधना।।


इसके चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में ८-८ वर्ण होते हैं। चरण में वर्णों का क्रम लघु-गुरु-लघु-गुरु-लघु-गुरु-लघु-गुरु (।ऽ।ऽ।ऽ।ऽ) होता है। गणों में लिखे तो जगण-रगण-लगण-गगण। उदाहरण :


नमामि भक्तवत्सलं कृपालुशीलकोमलम्।भजामि ते पदाम्बुजम् अकामिनां स्वधामदम्॥


इसे वंशस्थविल अथवा वंशस्तनित भी कहते हैं । इसके चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में १२ वर्ण होते हैं और गणों का क्रम होता है – जगण, तगण, जगण, रगण। प्रत्येक चरण में पाँचवे और बारहवे वर्ण के बाद यति होती है। जैसे -


गिरिन्द्र में व्याप्त विलोकनीय थी,वनस्थली मध्य प्रशंसनीय थीअपूर्व शोभा अवलोकनीय थीअसेत जम्बालिनी कूल जम्बुकीय।।


शिखरिणी छंद में क्रमशः यगण, मगण, नगण, सगण, भगण होने से 12 वर्ण होते हैं और लघु तथा गुरु के क्रम से प्रत्येक चरण में वर्ण रखे जाते हैं और 6 तथा 11 वर्णों के बाद यति होती है। उदाहरण :


यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवंतदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादधिगतंतदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः॥


इसमें 19 वर्ण होते हैं। 12, 7 वर्णों पर विराम होता है। हर चरण में मगण , सगण , जगण , सगण , तगण , और बाद में एक गुरु होता है। उदाहरण :


रे रे चातक ! सावधान-मनसा मित्र क्षणं श्रूयताम्अम्भोदा बहवो वसन्ति गगने सर्वे तु नैतादृशाः ।केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथायं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥


इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के चरण जब एक ही छन्द में प्रयुक्त हों तो उस छन्द को उपजाति कहते हैं। उदाहरण :


नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥


वसन्ततिलका छन्द सम वर्ण वृत्त छन्द है। यह चौदह वर्णों वाला छन्द है। 'तगण', 'भगण', 'जगण', 'जगण' और दो गुरुओं के क्रम से इसका प्रत्येक चरण बनता है।उदाहरण-


हे हेमकार पर दुःख-विचार-मूढकिं माँ मुहुः क्षिपसि वार-शतानि वह्नौ।सन्दीप्यते मयि तु सुप्रगुणातिरेकोलाभः परं तव मुखे खलु भस्मपातः॥


इन्द्रवज्रा छन्द एक सम वर्ण वृत्त छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 11-11 वर्ण होते हैं। इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु के क्रम से वर्ण रखे जाते हैं।उदाहरण-


विद्येव पुंसो महिमेव राज्ञःप्रज्ञेव वैद्यस्य दयेव साधोः।लज्जेव शूरस्य मुजेव यूनो,सम्भूषणं तस्य नृपस्य सैव॥


उपेन्द्रवज्रा एक सम वर्ण वृत्त छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 11-11 वर्ण होते हैं। उपेन्द्रवज्रा छन्द के प्रत्येक चरण में 'जगण', 'तगण', 'जगण' और दो गुरु वर्णों के क्रम से वर्ण होते हैं। उदाहरण:


त्वमेव माता च पिता त्वमेवत्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेवत्वमेव सर्वं मम देव-देव॥