सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर हंगामा बरपा हुआ है। स्थिति ये है कि आंदोलन की सूत्रधार रेहाना फ़ातिमा ने मंदिर में अपनी इस्तेमाल की हुई सेनिटरी पैड भगवान अयप्पा को चढ़ाने का प्रयास कर रही थी। मन्दिर में महिलाओं को प्रवेश दिलाने के आंदोलन की वजाय महिलाओं की स्वच्छता और स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए सभी को आगे बढ़कर काम करना चाहिए। स्वच्छता तो जीवन का अंग है उसे अपनाने से कौन रोक सकता है। जो लोग मन्दिर में प्रवेश को लेकर आंदोलन कर रहे हैं उन्हें इन मुद्दों पर लड़ाई लड़नी चाहिए। महिलाओं को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना चाहिए। एक मंदिर में प्रवेश मिल जाने से क्या स्वच्छता आ जायगी? आज भी किसी दुकान में सेनिटरी पैड ख़रीदने जाओ तो काली प्लास्टिक और अखबार में ऐसे छिपाकर देते हैं जैसे बम खरीद रहे हों।जागरूकता पर वहां बल देने की जरूरत है। आज भी गांव की औरतें कपड़े का इस्तेमाल करती है उन्हें जागरूक करने की जरूरत है। इस विषय पर कोई खुलकर बात करना नहीं चाहता। मैंने इस मुद्दे पर कई स्कूलों में प्रशिक्षण दिया है लेकिन पढ़ी लिखी शिक्षिकाएं भी खुलकर बात करने से हिचकती है। जबतक लोग जागरूक नहीं होंगे सरकार की सारी कोशिशें बेकार होंगी। लोग बेवजह मन्दिर मस्जिद के मसले पर बवाल करते रहेंगे। असली मुद्दों पर किसी का ध्यान ही नहीं। महिला तब सशक्त होंगी जब हम उन्हें अपने घरों में ही सशक्त करेंगे। उन्हें उनका अधिकार देंगे।
पंकज प्रियम
Sunday, October 21, 2018
पीरियड्स बनाम सबरीमाला
Saturday, October 20, 2018
सबरीमाला आंदोलन
दक्षिण में सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उठा आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। लोग इसे महिलाओं के अस्तित्व पर सवाल उठा रहे हैं। आंदोलनकारी रजस्वला औरतों को मन्दिर में प्रवेश पर रोक का विरोध कर रहे हैं।
बात यहाँ अस्तित्व की नहीं है।स्वच्छता और सुचिता की है। नवरात्र में भी कन्यापूजन का विधान है कन्या यानी जो अबतक रजस्वला नहीं हुई हो। जिन लड़कियों की माहवारी शुरू हो जाती उन्हें कन्यापूजन में नहीं बिठाया जाता। जहां तक सबरीमाला का सवाल है तो ये उसकी आस्था का प्रश्न है। स्वामी अयप्पा अगर ब्रह्मचारी हैं तो महिलाओं के वहां प्रवेश की आवश्यकता ही नहीं। जैसे हनुमान जी को महिलाएं स्पर्श कर पूजा नहीं करती। शालिग्राम को भी महिलाएं नहीं छूती। अपने अपने धर्म और पन्थो की अपनी मर्यादा है। जैसे मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश वर्जित है वहां तो कोई विरोध नहीं होता। बात चाहे तीन तलाक की हो या फतवे जारी करने की सुप्रीम कोर्ट भी मुस्लिम कानूनी मामलों में हस्तक्षेप करने से मना कर देती है। कहती है कि यह उनके धर्म का मसला है तो फिर सबरीमाला को लेकर इतना विवाद क्यों?हां तो यहां तो कामख्या मन्दिर में योनि की पूजा होती है और रजस्वला के दिनों निकले रक्तनुमा स्राव को लोग कपड़ों में पोंछ कर बड़ी श्रद्धा के साथ अपने पास रखतें हैं। आषाढ़ माह में धरती के रजस्वला होने पर तीन दिन तक हल नहीं चलाया जाता ताकि धरती माता को तकलीफ न हो। बात यहां सुचिता और शारीरिक स्वच्छता व स्वास्थ्य की भी है।अमूमन हर औरत खुद माहवारी में पूजा पाठ छोड़ देती है क्योंकि उन्हें खुद स्वच्छ महसूस नहीं होता। दिल से कोई भी औरत कह दे कि माहवारी के दौरान पूजा पाठ करना चाहती हैं? पूजा पाठ के लिए तनमन दोनों का स्वच्छ होना आवश्यक होता है।कोई भी औरत उन दिनों खुद को स्वस्थ और स्वच्छ नही महसूस करती। और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखें तो माहवारी के दिनों में महिलाओं को सबसे अधिक आराम की जरूरत होती है और उन्हें संक्रमण का खतरा अधिक होता है। यही नहीं उस दौरान सहवास भी प्रतिबंधित होता क्योंकि बीमारियों का खतरा होता हस। । इसलिए प्राचीन काल में उन्हें सभी घरेलू कार्यों से मुक्त रखा गया ताकि वो आराम कर सकें। आखिर इसी दौरान मन्दिर में प्रवेश का हठ क्यूँ?उसके बाद तो कोई रोक नहीं है।
पंकज प्रियम
Saturday, October 13, 2018
छंद
छंदों के नाम ( मात्रा सहित )-*
*1.छवि छंद-8 मात्रिक*
22121
*2.गंग छन्द -9 मात्रिक*
22122
*3.शशिवदना छन्द-10 मात्रिक*
4 4 2
*4.रेवा छन्द -11 मात्रिक*
222221
*5.तोमर छंद -12 मात्रिक*
चरणांत - गुरु लघु
*6.उल्लाला छंद-13 मात्रिक*
चरणांत -लघु गुरु का कोई बन्धन नहीं
*7.सखी छंद-14 मात्रिक*
चरणांत यगण या मगण
*8.चौपइ छंद-15 मात्रिक*
चरणांत गुरु लघु
*----------------------*
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*अभ्यासियों के अवलोकनार्थ*
Thursday, October 11, 2018
मैं आऊंगा माँ-एक शहीद का पत्र
मेरी प्यारी माँ
सादर चरण स्पर्श!
आज तक मैं हर जंग तुम्हारे ही प्यार और आशीर्वाद से जीत सका हूँ। हर मौके पर तुमने मेरा हौसला बढ़ाया है और मुस्कुरा कर मुझे विदा किया। उन मुस्कुराहटों में तुम्हारा दर्द मैंने हरबार देखा लेकिन तुमने जाहिर होने नहीं दिया। कहीं मैं कमजोर न पड़ जाऊं।
माँ आज मैंने बहुत वीरता के साथ लड़ाई लड़ी। दर्जन भर दुश्मनों को ढेर किया है तुम्हारे लाल ने। अब थक गया हूँ माँ... धरती मैया की गोद में तुम्हारे ही असीम प्यार की अनुभूति हो रही है। फिर से एक लोरी सुनाओ न माँ ताकि गहरी नींद आ जाये मुझे। मैं आऊंगा माँ... तुमसे वादा किया था....तिरंगे में सजा...जवानों के कांधे पर सवार होकर...राष्ट्रगान बजाते बैंडबाजा के साथ...मैं आ रहा हूँ...माँ..तू रोयेगी तो नहीं न माँ.....अपनी गोद में सुलाकर हंसते हुए लोरी सुनाना माँ... आँसू नहीं बहाना माँ.... नहीं तो कैसे जा पाऊंगा एक नई जंग के लिए।
तुम मेरी शादी को लेकर जिद कर रही थी न माँ.. देखो ...कितनी सुंदर सजधज कर मेरी दुल्हन खड़ी है...साथ ले जाने को...हाँ ! माँ ,मौत है नाम उसका जो मेरी दुल्हन बनी है। बहुत ध्यान रखेगी माँ. । बाबा से कहना कि ओ भी नहीं रोएं ..मुझे पता है जब भी मैं घर से निकला वो चुपचाप सिसकते रहे। उनकी खामोशी में सिसकियां सुनी है माँ। कहना कि उनका लाल अमर हो गया। बचपन की तरह फिर मुझे कांधे पर उठाकर लेकर जाएं। उनके कांधे पर चढ़कर मैं फिर बच्चा बन जाऊंगा माँ..
अच्छा माँ ...आ ...रहा हूँ ..तेरी गोदी में सोने को माँ
तुम्हारा अजय
©पंकज प्रियम
गिरिडीह, झारखण्ड
Sunday, September 30, 2018
छंद अभ्यास
1.शशिवदना
-दो चतुष्कल एक द्विकल
4 4 2
तुझको पाना है
दिल ने ठाना है
सबने जाना है
तुझको आना है।
2.गंग छंद
वर्णमात्रा--9
221 22
मन को न भाया
तन को न पाया
कुछ भी न बोलो
आँखे न खोलो।
3.रेवा छेह
वर्णमात्रा--11
222 221
सपना हो साकार।
सुखमय हो संसार।
लो जीवन में ठान।
सबमें बांटों प्यार।
4.छवि छंद
वर्णमात्रा --8
221 21
तन से फकीर
मन से अमीर
जग जीत जाय
सबको लुभाय।
🙏🙏🙏🙏
✍पंकज प्रियम
Friday, July 20, 2018
भूख और अंगूठा
भुख और अंगूठा
आज बुधिया के घर बड़े बड़े अफसरों की भीड़ लगी थी। नेताओं का जमावड़ा था। कोई एक बोरी चावल लेकर आया था तो कोई गेंहू भर टोकरी।कोई उसे दो हजार के नोट दे रहा था तो कोई बाबू चेक थमा रहा था। वह पथराई आंखों से एकटक चुपचाप सबको देखे जा रहा था। गोद में उसकी बेटी सुलमी की लाश पड़ी थी जो कल रात भात भात कहते मर गयी । कई दिनों से घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था और पास में फूटी कौड़ी तक नहीं। बीमारी की वजह से वह काम पर भी नहीं जा पा रहा था।
'काश!आज सुगना जिंदा होती तो कहीं से भी जुगाड़ कर लेती और बेटी को मरने नहीं देती। सच ही तो सब कहते हैं कि घर की लक्ष्मी के जाते ही घर घर नहीं श्मशान हो जाता है।"
अरे!सरकार एक रुपये किलो अनाज दे रही है क्या तुम्हारे पास कार्ड नहीं हैं? एक बाबू ने झिड़की लगा दी।
'कार्ड!
लाल कार्ड घर के कोने में पड़ा मानो बुधिया को चिढ़ा रहा था।
करीब एक सप्ताह से वह राशन दुकान का चक्कर लगाकर लगाकर थक चुका था। बीमार शरीर को मानो पैरों पर ढोकर ले जाता था। आसमान से आग बरसाते सूर्य देव को भी कहाँ तरस आती थी। लगता था रास्ते में ही टें बोल जाएगा। घर से करीब कोस भर दूर था डीलर बाबू का दुकान। जाते जाते आधा प्राण तो उड़ जाता था। राशन दुकान पंहुंच कर निढाल पड़ जाता था । ई तो डीलर की बूढ़ी मांय है जो पानी गुड़ पूछती थी। पुराने बुजुर्ग ही तो थोड़ा मान सत्कार को बचाकर रखे हैं। नहीं तो आज के लोग ! दुवार पर आए मेहमानों की आवभगत तो दूर बैठने को भी नहीं पूछते।
'ए बाबू! आज देख न मशीनवा काम करतो की नैय।' घर मे एक छटाक भी अनाज नाय हो।"बुधिया बड़ी कातर भाव से डीलर की मिन्नत कर रही थी।
डीलर ने कई बार कोशिश की लेकिन बायोमीट्रिक मशीन बुधिया के अँगूठे को पढ़ नहीं पा रहा था। पढ़ता भी कैसे? मजदूरी करते करते बुधिया की उंगलियां घिसकर सपाट हो गयी थी, मानो भाग्य की लकीर ही मिट गई थी।
'नहीं !नहीं काम कर रहा है मशीन। दूसरे दिन आना। जाओ अभी बहुत भीड़ है।"डीलर ने झिड़कते हुए कहा ।
"ए डीलर बाबू! जब मशीनवा पढतो तब,अभी एक किलो चावर दे दे। खाय खतिर कुछ तो दे। सुलमी बीमार है भूखे भात भात कर रहलो" बुधिया ने रोते हुए कहा।
"तो हम क्या करें। बिना मशीन के हम अनाज नहीं दे सकते। जाओ यहां से।"डीलर ने धकियाते हुए दुकान से बाहर कर दिया।
आज बिल्कुल टूट गया था बुधिया। थकहार कर वापस खाली हाथ घर की ओर चल पड़ा। कदम उठाते न उठ रहे थे। खुद को घसीटते हुए वह घर की ओर चल पड़ा। पिछले एक सप्ताह से वह डीलर के यहां चक्कर लगा रहा था लेकिन हरबार निराशा ही हाथ लगी। मशीन उसका अंगूठा नहीं पढ़ पा रही थी। वह डीलर बाबू की मिन्नतें करता कि एक किलो ही अनाज दे दो लेकिन वह झिड़क कर भगा देता।
"बापू !भात ....भात... बहुत जोर से भूख लगल हो। नाय बचबो। घर घुसते ही सुलमी कि आवाज सीधे दिल को भेद रही थी। बुधिया सुलमी को गोद मे लेकर फूट फूट कर रो पड़ा। भूख के मारे तो उसकी भी जान निकल रही थी लेकिन बेटी की भूख के आगे उसकी सारी भूख मर चुकी थी। सुलमी रात भर भात.. भात जपती रही। बुधिया की कब आंख लग गयी पता ही नहीं चला।
सुबह आँख खुली तो आँखे फ़टी रह गयी। सुलमी निष्प्राण होकर जमीन पर पड़ी थी। बुधिया की अनुभवी आंखों ने तुरंत ताड़ लिया की सुलमी अब इस दुनिया में नहीं रही। वह बेटी से लिपटकर दहाड़ मारकर रो पड़ा।
सुबह होते ही सुलमी के मौत की खबर आग की तरह फैल गयी। गांव के लोग तमाशा देखने पहुंच गए। आज सभी ढाढ़स देने लगे'अरे! होनी को कौन टार सकता है। बेचारी भूख से मर गयी। किसी ने अखबार वाले को खबर कर दिया वे कैमरा लेकर पहुंच गए। देखते देखते मामले ने तूल पकड़ लिया। बड़े बड़े अधिकारी पहुंचने लगे। उसके घर अनाज और पैसों की बरसात होने लगी। डॉक्टर साहब ने जांच पड़ताल कर कह दिया कि सुलमी की मौत भूख से नहीं बीमारी के कारण हुई हैं। बड़े बाबुओं ने कागज पर ठेपा भी लगवा लिया। जो अंगूठा मशीन नहीं पढ़ पा रही थी वो बाबुओं के काम आ गयी। बुधिया कभी अनाजों के ढेर को देखता कभी सुलमी की लाश को और कभी आने अंगूठे को।
©पंकज भूषण पाठक"प्रियम"
गिरिडीह, झारखंड
Tuesday, June 19, 2018
अंगूठा
लघुकथा
अंगूठा
आज बुधिया के घर बड़े बड़े अफसरों की भीड़ लगी थी। नेताओं का जमावड़ा था। कोई एक बोरी चावल लेकर आया था तो कोई गेंहू भर टोकरी।कोई उसे दो हजार के नोट दे रहा था। वह एकटक चुपचाप सबको देखे जा रही थी। उसकी बेटी सुलमी कल भात भात कहते मर गयी। घर में एक दाना अनाज नहीं था। एक सप्ताह से राशन दुकान का चक्कर लगाकर थक चुका था। मशीन उसका अंगूठा नहीं पढ़ पा रही थी। वह डीलर बाबू की मिन्नतें करता कि एक किलो ही अनाज दे दो लेकिन वह झिड़क कर भगा देता।
सुबह जैसे ही सुलमी के मौत की खबर लगी उसके घर अनाज और पैसों की बरसात हो रही है। डॉक्टर साहब ने जांच पड़ताल कर कह दिया कि सुलमी की मौत भूख से नहीं बीमारी के कारण हुई हैं। बड़े बाबुओं ने कागज पर ठेपा भी लगवा लिया। जो अंगूठा मशीन नहीं पढ़ पा रही थी वो बाबुओं के काम आ गयी। बुधिया कभी अनाजों के ढेर को देखता कभी सुलमी की लाश को और कभी आने अंगूठे को।
©पंकज प्रियम
19.6.2018